देवशर्मा - आषाढभूति

 

देवशर्मा – आषाढभूति कथा (मित्रभेदः, कथा 4)

 

निम्बशुच – दुःशील कथा

 

दुर्वासा- दुःशील कथा

 

देवशर्मा एवं तस्य शिष्यस्य आषाढभूतेः यः कथा पंचतन्त्रे प्रकटति, अस्य कथायाः पूर्वरूपं स्कन्द पुराणेपि विद्यमानमस्ति। तत्र देवशर्मा स्थाने निम्बशुचः संज्ञा अस्ति एवं आषाढभूति स्थाने दुःशीलः नामास्ति। यं नदीं देवशर्मा पारं करोति, यस्य तटे तस्य धनस्य हरणं भवति, तस्य संज्ञा पंचतन्त्रे न भवति, किन्तु स्कन्दपुराणे अस्य संज्ञा मुरला अस्ति। आषाढभूतिना धनहरणस्य पश्चात् सः अस्य धनस्य किं उपयोगं करोति, अयं पंचतन्त्रे न विद्यते, किन्तु स्कन्दपुराणे विद्यते। तद्धनेन सः गार्हस्थ्य जीवने प्रवेशं करोति, आयोः अन्तिमे चरणे दुर्वासा मुनेः सकाशात् दीक्षां गृह्णाति, स्वकृतस्य पूर्वदुष्कर्मणां प्रायश्चित्तं करोति। पंचतन्त्रस्य कथायां अयं अतिरिक्तं अस्ति यत् धनस्य हानेः पश्चात् देवशर्मणः कः अवस्था भवति। देवशर्मा शब्दः महत्त्वपूर्णमस्ति। ऋग्वेदे द्विप्रकारस्य शर्मस्य उल्लेखं भवति – देव शर्म एवं मानुष शर्म। द्योर्मध्ये किं अंतरमस्ति, न जानीमः। शर्म किं भवति, अस्य अनुमानं एव कर्तुं शक्नुमः। यदा कोपि भयं, मृत्युभयं, क्षुधाभयं इत्यादि न भवति, सा स्थितिः शर्मस्य भवति। शर्म स्थितिः ब्राह्मणाय भवति, वर्म स्थिति क्षत्रियाय। पुराणेषु एका कथा अस्ति यत्र इन्द्रः देवशर्मा परिव्राजकस्य पत्न्याः रुच्याः उपभोगं कर्तुं आगच्छति एवं रुचि अपि तद्हेतु स्वीकृतिं ददाति। किन्तु देवशर्मणः शिष्यः विपुलः रुच्याः चेतनायाः आवेष्टनं करोति येन कारणेन रुचि निश्चेष्टं भवति। अयं वर्मस्य उदाहरणं अस्ति, न शर्मस्य। किं अस्य कथायाः सार्वत्रीकरणं सम्भवमस्ति यत् यः कोपि देवशर्मणः शिष्यः अस्ति- यथा दुःशीलः, आषाढभूतिः, तस्य कार्यं वर्मस्य एव भवति।

 

    शर्म शब्दस्य उदाहरणरूपेण पद्म पुराणे गीतायाः द्वितीयअध्यायस्य माहात्म्यं उल्लेखनीयं अस्ति यत्र अजा एवं व्याघ्रोपि परस्परेण सहभावं धारणं कुर्वन्ति। गीतायाः द्वितीये अध्याये श्लोकः भवति – स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किं। ऋग्वेदे, बहूनि अपि देवाः शर्म प्रयच्छन्ति – अग्निः, पृथिवी, वसवः, इन्द्रः, मरुताः, अश्विनौ, बृहस्पतिः इत्यादि। विशेषरूपेण, अदितिः(ऋ.4.25.5) स्वआदित्य पुत्रेभिः शर्म प्रयच्छति(ऋ.1.107.2, 10.66.3, 4.54.6, 6.51.5, 10.63.7)। अतः अयं महत्त्वपूर्णं अस्ति  - यदि आदित्येभ्यः सकाशात् शर्म अपेक्षितं अस्ति, तर्हि अदिति, अखण्डित चेतनायाः अर्जनं अनिवार्यं भवति। अदिति अवस्था मध्ये संसारे द्यूतं न घटति। स्कन्दपुराणे पंचतन्त्रस्य कथायाः तुलनीय या कथा अस्ति, तत्र देवशर्मा नाम स्थाने निंबशुचः नाम अस्ति। निंबवृक्षस्य प्रसिद्धिकारणमस्ति यत् अयं वृक्षः आदित्यस्य शरणस्थलं अस्ति। अस्य अर्थमस्ति  - यः चेतना शुचि हेतु, स्वव्याधीनां,  निवारणहेतु सूर्यः भवति, स्वक्षुधायाः निवारण हेतु स्वभोजनमपि सूर्यस्य रश्मिभ्यः प्रापयति, अथवा सूर्यस्य गुणानां अवशोषणं करोति, सः निंबशुचः भवति। पुराणेषु उल्लेखमस्ति यत् देवशर्मा नूतन जन्मे सत्राजितः भवति। सत्राजितः सूर्य उपासनया एकं मणिं, स्यमन्तक(स्यम् – पाप) मणिः प्राप्तवान्। स्यमन्तकस्य प्राप्तिहेतोः केनापि जनेन सत्राजितस्य वधमभवत्। अंततः कृष्णः स्यमन्तकं प्राप्तवान्।

 

    पंचतंत्रस्य कथायां देवशर्मणः मठाधीशस्य यं धनं तस्य शिष्यः आषाढभूतिः आहरति, तस्य किं अर्थं सम्भवमस्ति। सूर्योपासकस्य, सूर्योपासनया शर्मप्रापणलक्ष्यात्मकस्य साधकस्य धनं स्यमन्तकं मणिं अस्ति। केषांचित् क्षुद्र सिद्धीनां प्रापणं शर्मस्य लक्षणं नास्ति। यदा व्यावहारिक जीवने प्रवेशं कुर्वन्ति, तदा दुःशीलोपरि नियन्त्रणाय एषां सिद्धीनां न बहु उपयोगं अस्ति।

 

पंचतन्त्रस्य कथायां देवशर्मणा दृष्टः कौलिकः, तस्य दुःशीला पत्नी, नापितस्य कथायाः किं तात्पर्यमस्ति, अयं अन्वेषणीयः।

 

ऋग्वेदे अच्छिद्रा शर्मस्य उल्लेखं 2.25.5, 3.15.5, 5.62.9, 6.49.7, 8.27.9

 

  

 

,०२७.०९  वि नो देवासो अद्रुहोऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ।

 

,०२७.०९ न यद्दूराद्वसवो नू चिदन्तितो वरूथमादधर्षति ॥

 

  

 

देवशर्मा – आषाढभूति कथा (मित्रभेदः, कथा 4)

 

 

 

निम्बशुच – दुःशील कथा

 

दुर्वासा- दुःशील कथा

 

देवशर्मा एवं उसके शिष्य आषाढभूति की जो कथा पंचतन्त्र में प्रकट हुई है, उस कथा का पूर्व रूप स्कन्द पुराण में भी है। वहां देवशर्मा के स्थान पर निम्बशुच नाम है एवं आषाढभूति के स्थान पर दुःशील नाम है। जो नदी देवशर्मा पार करता है, जिसके तट पर उसके धन का हरण होता है, उसका नाम पंचतन्त्र में नहीं है, किन्तु स्कन्द पुराण में उसका नाम मुरला है. आषाढभूति द्वारा धन के हरण के पश्चात् उस धन का क्या उपयोग करता है, यह पंचतन्त्र में नहीं है, किन्तु स्कन्द पुराण में है। उस धन के द्वारा वह गार्हस्थ्य जीवन में प्रवेश करता है, आयु के अन्तिम चरण में दर्वासा मुनि से दीक्षा ग्रहण करता है, अपने पूर्व के दुष्कर्मों का प्रायश्चित्त करता है। पंचतन्त्र की कथा में यह अतिरिक्त है कि धन की हानि के पश्चात् देवशर्मा की क्या अवस्था होती है। देवशर्मा शब्द महत्त्वपूर्ण है। ऋग्वेद में दो प्रकार के शर्मों का उल्लेख है – देवशर्म और मानुष शर्म। दोनों के मध्य क्या अन्तर है, यह ज्ञात नहीं है। शर्म क्या होता है, इसका हम अनुमान मात्र ही लगा सकते हैं। जब कोई भय - मृत्युभय, क्षुधाभय आदि न हो तो वह स्थिति शर्म की होती है। शर्म की स्थिति ब्राह्मण के लिए होती है, वर्म की क्षत्रिय के लिए। पुराणों में एक कथा आती है जहां इन्द्र देवशर्मा परिव्राजक की पत्नी रुचि का उपभोग करने के लिए आता है एवं रुचि भी उसके लिए अपनी स्वीकृति दे देती है. किन्तु देवशर्मा का शिष्य विपुल रुचि की चेतना का आवेष्टन कर लेता है और रुचि निश्चेष्ट हो जाती है. यह वर्म का उदाहरण है, शर्म का नहीं। क्या इस कथा का इस प्रकार सार्वत्रीकरण किया जा सकता है कि जो भी देवशर्मा का शिष्य होगा, जैसे दुःशील, आषाढभूति आदि, उसका कार्य वर्म का ही होगा. शर्म सब्द के उदाहरण के रूप में पद्मपुराण गीता द्वितीय अध्याय के माहात्म्य का उल्लेख किया जा सकता है जहां अजा एवं व्याघ्र भी परस्पर सहभाव धारण करते हैं। गीता के द्वितीय अध्याय का श्लोक है - स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किं।  ऋग्वेद में बहुत से देवता शर्म प्रदान करते हैं – अग्नि, पृथिवी, वसुगण, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनौ, बृहस्पति इत्यादि। विशेष रूप से, अदिति (ऋ. 4.25.5) अपने आदित्य पुत्रों के दवारा शर्म प्रदान करती है(ऋ.1.107.2, 10.66.3, 4.54.6, 6.51.5, 10.63.7)। अतः यह महत्त्वपूर्ण है – यदि आदित्यों से शर्म की अपेक्षा है तो अदिति, अखण्डित चेतना का अर्जन भी अनिवार्य है। अदिति अवस्था में संसार में द्यूत घटित नहीं होती। स्कन्द पुराण में पंचतन्त्र की कथा की जो तुलनीय कथा है, वहां देवशर्मा के नाम के स्थान पर निंबशुच नाम है। निंबवृक्ष की प्रसिद्धि का कारण यह है कि यह वृक्ष आदित्य की शरणस्थली है। इसका अर्थ है – जो चेतना शुचि हेतु, स्वव्याधियों के निवारण हेतु सूर्य बनती है, क्षुधा के निवारण हेतु अपना भोजन भी सूर्य की रश्मियों से प्राप्त करती है, अथवा सूर्य के गुणों का अवशोषण करती है, वह निंबशुच चेतना है। पुराणों में उल्लेख है कि देवशर्मा नए जन्म में सत्राजित बनता है. सत्राजित ने सूर्य उपासना द्वारा एक मणि, स्यमन्तक (स्यम् – पाप) मणि  प्राप्त की। स्यमन्तक की प्राप्ति हेतु एक व्यक्ति ने सत्राजित को मार दिया। अन्ततः स्यमन्तक कृष्ण को प्राप्त हुई।

 

पंचतन्त्र की कथा में मठाधीश देवशर्मा का जो धन उसका शिष्य आषाढभूति हरण करता है, उसका क्या अर्थ सम्भावित है. सूर्योपासक का, सूर्योपासना द्वारा शर्म प्राप्ति जिस साधक का लक्ष्य है, उसके लिए स्यमन्तक मणि प्राप्ति ही उसका धन है। कुछेक क्षुद्र सिद्धियों की प्राप्ति शर्म का लक्षण नहीं है। जब व्यावहारिक जीवन में प्रवेश करते हैं, तब दुःशील के ऊपर नियन्त्रण करने के लिए इन सिद्धियों का बहुत उपयोग नहीं है। पंचतन्त्र की कथा में देवशर्मा द्वारा द्रष्ट कौलिक, उसका दुःशीला पत्नी, नापित की कथा का क्या तात्पर्य है, यह अन्वेषणीय है.

 

प्रथम प्रकाशन - फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत् २०७२(२७ फरवरी, २०१६ई.)