Esoteric aspect of Dushyanta

 

दुर्वार्क्षी भागवत ९.२४.४३(वृक - पत्नी, तक्ष, पुष्कर आदि की माता ) ।

 

 

 

दुर्वासा गर्ग १.२० (दुर्वासा द्वारा कृष्ण के मुख में ब्रह्माण्ड का दर्शन, कृष्ण की स्तुति), ४.१ (दुर्वासा का भाण्डीर वन में आगमन, कृष्ण द्वारा सत्कार, गोपियों द्वारा प्रदत्त भोजन के भोग की कथा), ६.१०.३८ (दुर्वासा द्वारा कुबेर के मन्त्रियों घण्टानाद व पार्श्वमौलि को शाप देकर गज व ग्राह बनाना), देवीभागवत ९.४०.३ (पारिजात पुष्पों का तिरस्कार करने के कारण दुर्वासा द्वारा इन्द्र को भ्रष्ट - श्री होने का शाप), पद्म १.४ (दुर्वासा को विद्याधरों से प्राप्त माला का इन्द्र द्वारा अपमान करने पर दुर्वासा द्वारा इन्द्र को शाप), २.१२.१२२ (तप सिद्धि न होने पर दुर्वासा द्वारा धर्म को तीन शाप : राजत्व, दासी पुत्रत्व तथा चाण्डालत्व), ४.८(माला की अवमानना पर दुर्वासा द्वारा इन्द्र को शाप), ६.१८४.७५(दुर्वासा को देखकर नग्न अप्सरा द्वारा पद्मिनी का रूप धारण, दुर्वासा द्वारा पद्मिनी बनने का शाप), ६.२०५(दुर्वासा से शापित शिवशर्मा की निगमोद्बोध तीर्थ में देहत्याग से मुक्ति), ६.२३१(दुर्वासा द्वारा इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप), ब्रह्मवैवर्त्त २.३६.४(दुर्वासा द्वारा इन्द्र को शाप), २.५१.२१ (सुयज्ञ नृप द्वारा अतिथि तिरस्कार पर दुर्वासा द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया), ३.२०.५०(महेन्द्र को दुर्वासा द्वारा पारिजात पुष्प प्रदान, पुष्प का माहात्म्य), ४.७.१३२(वसुदेव द्वारा दुर्वासा को अपनी पुत्री प्रदान करना), ४.११.१५(पाण्ड~य देशाधिपति सहस्राक्ष का दुर्वासा द्वारा शापित होना), ४.१६.३९ (वसुदेव को दुर्वासा द्वारा योग प्राप्ति), ४.२३.१(दुर्वासा द्वारा तिलोत्तमा एवं बलिपुत्र को ब्रह्मशाप), ४.२४.१(दुर्वासा द्वारा कन्दली को पत्नी रूप में स्वीकार करना), ४.२५ (और्व द्वारा दुर्वासा को शाप), ४.२५ (अम्बरीष - एकादशी उपाख्यान में दुर्वासा की सुदर्शन चक्र से मुक्ति), ४.५० (केश युक्त भोजन के कारण दुर्वासा द्वारा अम्बरीष के लिए कृत्या उत्पन्न करना, दुर्वासा का दर्प भङ्ग होना), ४.६०.४२(दुर्वासा द्वारा नहुष को शाप), ४.११२.५० (दुर्वासा का कृष्ण से संवाद), ब्रह्माण्ड २.३.८.८२(दत्तात्रेय - अनुज), ३.४.६.१३ ( दुर्वासा द्वारा विद्याधरों से दिव्य माला की प्राप्ति, शक्र को माला प्रदान करना, शक्र द्वारा माला की अवमानना से दुर्वासा द्वारा श्रीहीन होने का शाप), भविष्य १.७२(दुर्वासा मुनि द्वारा साम्ब को शाप प्रदान), भागवत १.१५.११(कृष्ण द्वारा वन में दुर्वासा व उनके शिष्यों को तृप्त कर पाण्डवों की दुर्वासा के कोप से रक्षा का कथन), ४.१.१५(अत्रि व अनसूया के ३ पुत्रों में से एक), ९.४(दुर्वासा द्वारा अम्बरीष के लिए कृत्या उत्पन्न करना, चक्र द्वारा दुर्वासा का पीछा, अम्बरीष से क्षमा याचना से मुक्ति), ४.१.३३(दुर्वासा की शिव के अंश से उत्पत्ति का उल्लेख), ६.१५.१३(ज्ञान दान हेतु पृथिवी पर विचरण करने वाले सिद्धों में से एक), ८.५.१६(दुर्वासा के शाप से इन्द्र सहित तीनों लोकों के श्रीभ्रष्ट होने पर समुद्र मन्थन का उद्योग), ९.५ (दुर्वासा द्वारा अम्बरीष के लिए कृत्या उत्पन्न करना, चक्र द्वारा दुर्वासा का  पीछा, मुक्ति), ११.१.१२(पिण्डारक क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषियों में से एक), वराह १६(दुर्वासा द्वारा इन्द्र को शाप दान का उल्लेख), ३८ (दुर्वासा का बुभुक्षाग्रस्त व्याध के पास आगमन, व्याध द्वारा अन्न व जल से दुर्वासा को संतुष्ट करने का वृत्तान्त, दुर्वासा द्वारा वर प्रदान, व्याध का सत्यतपा नामकरण), ३९.११+ (दुर्वासा द्वारा सत्यतपा व्याध को कर्मकाण्ड के चार भेदों में से चतुर्थ विविध द्वादशी व्रतों के विधान व माहात्म्य का वर्णन), वामन २.४७(दुर्वासा की शंकर के अंश से उत्पत्ति), वायु ७०.७६/२.९.७६(दत्तात्रेय - अनुज, अबला - भ्राता), विष्णु १.९(शंकर के अंशावतार, विद्याधरों से दिव्य माला का ग्रहण, इन्द्र को प्रदान, इन्द्र द्वारा माला के तिरस्कार से क्रुद्ध दुर्वासा द्वारा इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप प्रदान), विष्णुधर्मोत्तर १.२५(अत्रि - पुत्र, रुद्र का अवतार), शिव ३.१९.२७ (अत्रि व अनसूया के तीन पुत्रों में से एक, शिवांश दुर्वासा द्वारा अम्बरीष की परीक्षा), ३.३७ (दुर्योधन की प्रेरणा से दुर्वासा का पाण्डवों के पास गमन, शाक द्वारा दुर्वासा की तृप्ति), स्कन्द २.१.१४.३०(दुर्वासा द्वारा सुमति को ब्रह्महत्या से मुक्ति के उपाय का कथन), २.८.५ (दुर्वासा का विश्वामित्र के पास आगमन, कौत्स द्वारा दुर्वासा की तुष्टि), ३.१.३४ (दुर्वासा द्वारा सुमति को ब्रह्महत्या से छूटने के उपाय का कथन), ४.२.८५ (काशी में तप से फल प्राप्ति न होने पर दुर्वासा द्वारा काशी को शाप देने की चेष्टा, शिव का प्राकट्य, कामेश्वर लिङ्ग की स्थापना), ४.२.८८.२६ (दुर्वासा आदि का शिव निन्दा सुनकर दक्ष यज्ञ से बहिर्गमन), ४.२.९७.१७७ (दुर्वासेश लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.१.२३.२३(दुर्वासेश्वर का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.३.१०३(अनसूया का पुत्र प्राप्ति हेतु तप, देवों के वरदान स्वरूप दुर्वासा, दत्तात्रेय व सोम नामक पुत्रों की प्राप्ति  ) , ६.४९(कलश नृप के गृह में दुर्वासा का आगमन, भोजन में मांस देखकर नृप को व्याघ्र होने का शाप देना), ६.९९ (दुर्वासा का देवदूत से मन्त्रणा में रत राम से मिलन को आगमन, लक्ष्मण की प्रतिज्ञा भङ्ग होना), ६.११९(दुर्वासा द्वारा दीर्घबाहु राजा को महिष रूप होने का शाप दान), ६.२७४ (दुर्वासेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, दुःशील द्वारा अर्चना), ७.१.२३ (चन्द्रमा के यज्ञ में मैत्रावरुण), ७.१.१००(कृष्ण - पुत्र साम्ब द्वारा दुर्वासा का अपमान, साम्ब को कुष्ठ प्राप्ति का शाप दान), ७.१.२३६ (दुर्वासादित्येश्वर लिङ्ग का माहात्म्य), ७.४.२ (कृष्ण व रुक्मिणी द्वारा दुर्वासा के रथ का वाहन बनना, तृषित होने पर जलपान पर रुक्मिणी को शाप), ७.४.१७.११(कृष्ण की पुरी के पूर्व द्वार के रक्षकों में से एक), ७.४.१८+ (चक्र तीर्थ में गोमती में स्नान की चेष्टा पर दैत्यों द्वारा दुर्वासा का ताडन, वामन विष्णु द्वारा दैत्यों का निग्रह), हरिवंश २.८३.३५(दुर्वासा की सेवा से ब्रह्मदत्त - भार्याओं को पुत्र व कन्या की प्राप्ति), २.९४.४५ (प्रभावती को दुर्वासा से मनोवांछित पति को प्राप्त करने वाली विद्या प्राप्त होने का कथन), ३.१०९+ (हंस व डिम्भक द्वारा दुर्वासा का अपमान, शाप, जनार्दन को वर, द्वारका गमन, कृष्ण से संवाद), योगवासिष्ठ ६.१.१०५.९ (दुर्वासा द्वारा कुम्भ को रात्रि में स्त्री होने का शाप), लक्ष्मीनारायण १.१७४.१८० (दक्ष यज्ञ से बहिर्गमन करने वाले शैव ऋषियों में से एक), १.४८९.१(राजा कलश  द्वारा दुर्वासा को मांस रस युक्त भोजन परोसने पर शाप से व्याघ्र होना, शिव लिङ्ग दर्शन व नन्दिनी धेनु से संवाद पर व्याघ्र की मुक्ति), १.५४२.५२(दुर्वासा द्वारा तपोरत व्याध से अन्न व जल की मांग करना, तृप्त होने पर व्याध को सत्यतपा ऋषि बनने का वरदान व साधन के अभाव में मानसिक आराधना), १.५७३.२४ (राजा रविचन्द्र के यज्ञ में दुर्वासा का आगमन), २.९.९१(क्रोधन का जन्मान्तर में रूप), कथासरित् ३.२.३६(कुन्ती और दुर्वासा की कथा ) ; द्र. प्रणद्ब्रह्म, वंश अत्रि । durvaasaa/ durvasa

 

Short comments by Dr. Fatah Singh

 

 जब साधक साधना में सफलता के अत्यन्त निकट होता है, उस समय कोई पुरानी वासना प्रकट हो जाती है जो बडे कष्ट से दूर होती है । उसी का नाम दुर्वासा ऋषि है । ऐसा प्रतीत होता है कि वेद का तुर्वसु पुराणों में दुर्वासा ऋषि के माध्यम से चित्रित किया गया है ।तुर्वसु - कर्म में प्रवृत्त जीवात्मा, तुर्वसु - तुर + वसु - जल्दी भावना में डूबने वाला, भक्ति के मार्ग पर चलने वाला ।

 

 

 

दुर्विनीत ब्रह्माण्ड ३.४.२१.८७(भण्ड के सेनापति पुत्रों में से एक), स्कन्द ३.१.३५ ( इध्मवाह - पुत्र, माता के साथ अगम्या गमन, व्यास परामर्श से मुक्ति ) ।

 

 

 

दुर्वोढक लक्ष्मीनारायण ३.१८२.६३(तापस, अगले जन्म में पृथ्वीधर नामक राजा के पुत्र रूप में जन्म ) ।

 

 

 

दुला पद्म ३.१२.३(दुलिकाश्रम का संक्षिप्त माहात्म्य), ब्रह्माण्ड ३.४.३२.२९(वर्षा ऋतु में जलधारा बरसाने वाली १२ शक्तियों में से एक ) ।

 

 

 

दुल्लोल ब्रह्माण्ड २.३.७.४४१(सरमा के २ पुत्रों में से एक ) ।

 

 

 

दुष्कन्त ब्रह्माण्ड २.३.७४.३(मरुत्त के २ दत्तक पुत्रों में से एक, सरूप - पिता, तुर्वसु वंश ) ।

 

 

 

दुष्कर्ण भविष्य ३.३.३२.१८(कौरवांश, विष्वक्सेनीय राजा लहर के १६ पुत्रों में से एक ) ।

 

 

 

दुष्ट ब्रह्माण्ड ३.४.१०.८१(दुष्टशेखर : भण्ड द्वारा वामांस से सृष्ट असुरों में से एक), लक्ष्मीनारायण १.४२४.२१(दुष्ट के नाश हेतु काल का उल्लेख), कथासरित् ८.३.६७ (दुष्टदमन :विद्याधरराज, अजगर को पकडने का प्रयत्न, असफलता), ८.५.२५(प्रवहण का दुष्टदमन से साथ द्वन्द्व युद्ध), १०.४.२११(धर्मबुद्धि तथा दुष्टबुद्धि नामक वणिक् - पुत्रों की कथा ) । dushta

 

 

 

दुष्पण्य स्कन्द ३.१.२२ (पशुमान् - पुत्र, दुष्ट चरित्र, उग्रश्रवा शाप से विभिन्न योनियों की प्राप्ति, पिशाच योनि से मुक्ति आदि ) ।

 

 

 

दुष्पर ब्रह्माण्ड २.३.७.३७७(पिशाचों के १६ युगलों में से एक, पूरणा - पति ) ।

 

 

 

दुष्यन्त ब्रह्म १.११.१४५(पुत्रहीन मरुत्त द्वारा पूरुवंशी दुष्यन्त को गोद लेना, दुष्यन्त से करूरोम का जन्म), ब्रह्माण्ड २.३.६.२५(उपदानवी - पुत्र), भागवत ९.२०.७ (दुष्यन्त की शकुन्तला पर आसक्ति, पुत्र व पत्नी की  विस्मृति की कथा), ९.२३.१७(मरुत्त के दत्तक पुत्र पूरु वंशी दुष्यन्त का राज्य करने हेतु स्व वंश में लौटने का उल्लेख), मत्स्य ४९.१०(ऐलिन एवं उपदानवी - पुत्र, भरत - पिता, पूरु वंश), वायु ६८.२४/२.७.२४(उपदानवी - पुत्र), ९९.३/२.३७.३ (दुष्कृत : मरुत्त के २ दत्तक पुत्रों में से एक, तुर्वसु वंश), ९९.१३३/ २.३७.१२९(मलिन व उपदानवी के ४ पुत्रों में से एक, शकुन्तला से भरत पुत्र के जन्म का कथन), विष्णु ४.१६.५(दुष्यन्त : मरुत्त के २ दत्तक पुत्रों में से एक, दुर्वसु वंश), ४.१९.१०(ऐलीन के ४ पुत्रों में से एक, भरत - पिता, पूरु वंश ) । dushyanta

 

Esoteric aspect of Dushyanta

 

 

 

दुहद्रुह स्कन्द १.२.६३.२७(दुहद्रुह अश्वतरी का घटोत्कच - पुत्र सुह्रदय द्वारा वध, प्रक्षेपण स्थल की दुहद्रुह ग्राम नाम से प्रसिद्धि ) ।

 

 

 

दुहिता पद्म १.१५.३१८(दुहिता के अप्सरा लोक की ईश्वरी होने का उल्लेख), योगवासिष्ठ १.१८.२६(देह गृह में चिन्ता के दुहिता होने का उल्लेख ), द्र. पुत्री ।duhitaa

 

दुःख ब्रह्म १.१२६.९(गर्भ, जन्म, जरा, मृत्यु आदि के दुःखों का कथन), भागवत ७.१५.२४(विभिन्न प्रकार के दुःखों (भूतज, दैव, आत्मज ) को दूर करने के उपाय का कथन), ११.१९.४१(विषयभोगों की कामना का दुःख रूप से उल्लेख), वराह ११६.१० (लौकिक सुखों से वंचन पर उत्पन्न दुःखों का वर्णन), लक्ष्मीनारायण ३.१५२.२५(वेदना - पुत्र, अधर्म वंश), ३.१६८.८२(दुःखदेव के पूजन से दुःख - विसर्जन, दुःखदेव की मूर्ति के स्वरूप का कथन), कथासरित् ३.४.२६० (दुःखलब्धिका : देवसेन राजा की कन्या, कच्छपनाथ आदि अनेक राजाओं से विवाह, राजाओं का मरण, विदूषक द्वारा मारणकर्त्ता राक्षस के हाथ का कर्त्तन, राजकन्या से विवाह ) । duhkha/dukha

 

 

 

दु:शला भविष्य ३.३.३२.१७(कौरवांश, विष्वक्सेनीय राजा लहर के १६ पुत्रों में से एक ) ।

 

 

 

दु:शासन गरुड ३.१२.९७(दुःशासन की जरासंध से तुलना), गर्ग ७.२०.३३ (दु:शासन का प्रद्युम्न - सेनानी श्रुतदेव से युद्ध), १०.४९.१९ (दु:शासन का अनिरुद्ध - सेनानी बली से युद्ध), पद्म ६.१९१ (भृत्य, मृत्यु पर हस्ती बनना, गीता के १७वें अध्याय श्रवण से मुक्ति), भविष्य ३.३.१७.५ (दु:शासन का पृथ्वीराज - पुत्र नृहरि रूप में जन्म), ३.३.२६ - ९१ (दु:शासन का नृहर रूप में अवतरण), महाभारत उद्योग १६०.१२३(दुर्योधन द्वारा वर्णित सैन्य नदी  में दु:शासन के ओघ/तीव्र प्रवाह होने का उल्लेख ) । duhshaasana/ dushshasana

 

 

 

दु:शील स्कन्द ६.३७(दु:शील नामक शिव प्रासाद की उत्पत्ति की कथा), ६.२७४ (दु:शील द्वारा स्वगुरु निम्बशुचि के धन का अपहरण, धन से गृहस्थ पालन, दुर्वासा से परामर्श, स्वनाम से लिङ्ग स्थापना), कथासरित् १०.२.६८(दु:शीला : देवदास - पत्नी, परपुरुष में प्रेम होने से देवदास की हत्या ) । duhsheela/dushshila

 

 

 

दुःसह भविष्य ३.३.३२.१७(कौरवांश, विष्वक्सेनीय राजा लहर के १६ पुत्रों में से एक), मार्कण्डेय ५०.३८/४७.३८ (मृत्यु व अलक्ष्मी - पुत्र, ब्रह्मा द्वारा दुःसह को तुष्टि, पुष्टि हेतु आश्रय योग्य तथा त्यागने योग्य स्थानों का निर्देश), लिङ्ग २.६.८ (ज्येष्ठा - पति, उद्दालक का नाम), स्कन्द ५.२.३३.३०(जातहारिणी का पिता), ७.१.२९० (देवशर्मा - पुत्र, शिव मन्दिर में चोरी पर मृत्यु जन्मान्तर में सुदुर्मुख व कुबेर बनना), लक्ष्मीनारायण १.४१२.२(अधर्म - पुत्र दुःसह का चार पत्नियों बुभुक्षा, कलहा, दरिद्रता, मलिनता सहित लोक में निवास, देवों द्वारा दुःसह के निवास योग्य स्थानों का वर्णन), ३.१५२.२६(निर्ऋति - पुत्र, अधर्म वंश, दुःसह के निवास स्थानों का कथन ) । duhsaha/dussaha

 

 

 

दु:स्वभाव गर्ग १०.३५.२(दु:स्वभाव का सारण के साथ युद्ध ) ।

 

 

 

दूत अग्नि २४१.८(उत्तम दूत के लक्षण एवं भेद), नारद १.८८.११९ (दूती : राधा की अष्टम कला, स्वरूप), ब्रह्माण्ड ३.४.१९.४८(दूती : ललिता देवी की सहचरी १५ अक्षर देवियों में से एक), मत्स्य १७९.१०(अन्धकासुर के रक्त पानार्थ सृष्ट मातृकाओं में से एक ) ; द्र. शिवदूती ।duta

 

 

 

दूरदर्शी महाभारत शान्ति १३७(संकट से सावधान रहने के संदर्भ में दीर्घदर्शी/ दूरदर्शी, प्रत्युत्पन्नमति व दीर्घसूत्री मत्स्यों का दृष्टान्त ) ।

 

 

 

दूर्वा अग्नि ८१.५१ (व्याधि विनाश हेतु दूर्वा द्वारा होम), ३०८.२०(शान्ति प्राप्ति हेतु दूर्वा - हवन), गणेश १.६२.२, १.६२.२७ (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश को दूर्वाङ्कुर अर्पण से चाण्डाली, रासभ व वृषभ की मुक्ति की कथा), १.६३.१६ (कौण्डिन्य द्वारा स्वपत्नी आश्रया को दूर्वा माहात्म्य का वर्णन), १.६४.१७ (गणेश की कण्ठ ज्वाला की शान्ति हेतु मुनियों द्वारा दूर्वाङ्कुर अर्पण करने पर ज्वाला का शान्त होना), १.६६.११ (द्विज द्वारा श्रद्धापूर्वक दिए गए एक दूर्वाङ्कुर से ही गणेश की तृप्ति), १.६६.२८ (कौण्डिन्य - भार्या आश्रया का एक दूर्वाङ्कुर भार के तुल्य स्वर्ण मांगने इन्द्र के पास जाना), १.७६.१४ (दूर्व : शाकिनी - पति, बुध - पिता, वेश्यारत पुत्र बुध द्वारा पिता की हत्या), गरुड १.१३१.२ (दूर्वा अष्टमी व्रत विधि), नारद १.६७.६२(दूर्वा को शक्ति को अर्पण का निषेध), १.८७.१४९(दूर्वा होम से आयु प्राप्ति का उल्लेख), १.११३.१७ (श्रावण चतुर्थी में करणीय दूर्वा गणपति व्रत), १.११७.४५ (दूर्वा अष्टमी व्रत : भाद्रपद शुक्ल अष्टमी में करणीय), भविष्य ४.३१.१८ (दूर्वा मन्त्र का कथन), ४.५६ (विष्णु रोम व अमृत से दूर्वा की उत्पत्ति, दूर्वा अष्टमी व्रत का माहात्म्य), भागवत ९.२२.४२(दूर्व : नृपञ्जय - पुत्र, तिमि - पिता, भविष्य के राजाओं में से एक), वामन १७.९ (वासुकि नाग की पुच्छ एवं पीठ पर श्वेत - कृष्ण दूर्वा की उत्पत्ति का उल्लेख), स्कन्द १.२.१३.१७३(शतरुद्रिय प्रसंग में ऋतुओं द्वारा दूर्वाङ्कुरमय लिङ्ग की सर्व नाम से पूजा का उल्लेख), २.२.२२.७२(कूप में पितरों के वंश रूपी दूर्वा पर अवलम्बित होने तथा काल रूपी मूषक द्वारा दूर्वा के छेदन का कथन), २.७.२२.७२ (वंश रूप), ६.२५२.३७ (चातुर्मास  में राहु द्वारा दूर्वा का वरण), योगवासिष्ठ १.१६.८ (मन रूपी हरिण के लिए भोग रूपी दूर्वा का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.४४१.९१(वृक्ष रूप धारी श्रीहरि के दर्शन हेतु राहु के दूर्वा बनने का उल्लेख), २.२७.१०५ (दूर्वा की वासुकि पृष्ठ पर उत्पत्ति ) । duurvaa/ doorvaa/ durva

 

 

 

दूषण ब्रह्माण्ड २.३.८.५६(वाका के पुत्रों में से एक), भविष्य ४.९४.६४(कुञ्जर के धर्मदूषक होने का उल्लेख, अनन्त व्रत कथा), भागवत ५.१५.१५(भौवन व दूषणा - पुत्र, विरोचना - पति, विरज - पिता), वायु ७०.५० (विश्रवा व वाका - पुत्र), शिव ३.४२.१४(असुर, महाकालरूप शिव द्वारा वध), ४.१६ (दैत्य, महाकालशिव द्वारा वध), वा.रामायण ३.२३.३३(राक्षस सेनापति), ३.२६.१ (खर - सेनापति, राम द्वारा वध), ७.२४.३९(रावण द्वारा दूषण की सेनापति पद पर  नियुक्ति), लक्ष्मीनारायण २.८६.४२(विश्रवा व वाका के पुत्रों में से एक ) । duushana / dooshana/ dushana

 

 

 

दृक् ब्रह्माण्ड २.३.५.९६(ईदृक्, अन्यादृक्, नान्यादृक् आदि मरुतों के पंचम व षष्ठम गण का उल्लेख ) ।

 

 

 

दृढ पद्म १.२०.९३ (दृढ व्रत का माहात्म्य व विधि), ब्रह्माण्ड १.२.३६.४९ (दृढेषुधि : तामस मनु के ११ पुत्रों में से एक), २.३.७.२३९(दृढभक्ति : वानर नायक), भागवत ४.२८.३२ (दृढच्युत : अगस्त्य - पुत्र, इध्मवाह - पिता), ५.२०.१४ (दृढरुचि : कुशद्वीप के अधिपति हिरण्यरेता के पुत्रों में से एक), ९.२१.२३ (दृढहनु : सेनजित् के ४ पुत्रों में से एक), मत्स्य १०१.४४ (दृढ व्रत की विधि एवं माहात्म्य), वायु २३.१८३/१.२३.१७३(दृढव्रत : १८वें द्वापर में विष्णु अवतार शिखण्डी के ४ पुत्रों में से एक), १०१.१००/२.३९.१००(शत संख्या  का परिदृढ नाम), विष्णु ४.१९.३६(दृढहनु : सेनजित् के ४ पुत्रों में से एक), विष्णुधर्मोत्तर १.११८ (दृढस्यु : अगस्त्य - पुत्र, पुलह - पुत्र बनना), कथासरित्  ६.६.१०५ (दृढवर्मा : मध्यदेश का भूपति, मङ्कणक - पुत्री कदलीगर्भा पर आसक्ति, विवाह), १२.२.१९ (दृढमुष्टि : राजपुत्र मृगाङ्कदत्त के दस सचिवों में से एक), १२.२४.१३(दृढमुष्टि : मृगाङ्कदत्त के वियोग में प्राण देने को उद्धत तीन सचिवों में से एक, ऋषि महातपा द्वारा प्राणों की रक्षा का वृत्तान्त), १७.४.१२(दृढव्रत : तपोधन मुनि का शिष्य, मुक्ताफलकेतु को शाप, पद्मावती द्वारा प्रतिशाप का वृत्तान्त ) । dridha

 

 

 

दृढधन्वा मार्कण्डेय ७४.२१/७१.२१(दृढधन्वा - कन्या उत्पलावती द्वारा स्वराष्ट्र नृपति से मृगत्व योनि प्राप्ति के हेतु का वर्णन), स्कन्द ५.२.६९.३(विशालाक्षी - पिता, सुबाहु - श्वसुर), लक्ष्मीनारायण १.३२१.१(चित्रधर्म - पुत्र दृढधन्वा द्वारा मृगया काल में शुक के मुख से वैराग्य विषयक श्लोक का श्रवण, वाल्मीकि द्वारा राजा दृढधन्वा को उसके पूर्व जन्म के वृत्तान्त का वर्णन : पूर्व जन्म में सुदेव विप्र व उसकी पत्नी गौतमी द्वारा तप से पुत्र की प्राप्ति, पुत्र का गुरु बनकर दृढधन्वा का प्रबोधन ) । dridhadhanvaa

 

 

 

दृढनेमि भागवत ९.२१.२७(सत्यधृति - पुत्र, सुपार्श्व - पिता, भरत वंश), मत्स्य ४९.७०(सत्यधृति - पुत्र, सुधर्मा - पिता, अजमीढ वंश), विष्णु ४.१९.४९ (सत्यधृति - पुत्र, सुपार्श्व - पिता, पूरु वंश ) । dridhanemi

 

 

 

दृढमति स्कन्द २.१.१९(दृढमति शूद्र द्वारा सुमति विप्र से अनुष्ठान कर्म सीखना), ३.१.१० (दृढमति शूद्र द्वारा तप, सुमति विप्र द्वारा दृढमति को वैदिक कर्म का उपदेश, दृढमति द्वारा विभिन्न योनियों की प्राप्ति, गृध्र योनि में पापविनाश तीर्थ में मुक्ति ) । dridhamati

 

 

 

दृढरथ मत्स्य ४४.४२(नवरथ - पुत्र, शकुनि - पिता, क्रोष्टा वंश), ४९.५० (सेनजित् के ४ पुत्रों में से एक, अजमीढ वंश), वायु ९९.१११/ २.३७.१०७ (जयद्रथ - पुत्र, जनमेजय - पिता ) ।

 

 

 

दृढायु ब्रह्माण्ड १.२.३२.११९(तीन आगस्त्य ब्रह्मिष्ठों में से एक), मत्स्य २४.३३(पुरूरवा व उर्वशी  के ८ पुत्रों में से एक ) ।

 

 

 

दृढाश्व गर्ग ५.२४.५३ (वङ्ग देश का राजा, लोमश के शाप से कोल असुर बनना), देवीभागवत ७.९.३७(कुवलाश्व - पुत्र, हर्यश्व - पिता), भागवत ९.६.२३(धुन्धु असुर की मुखाग्नि से बचे कुवलाश्व के तीन पुत्रों में से एक), मत्स्य १२.३२(धुन्धुमार के तीन पुत्रों में से एक, प्रमोद - पिता, इक्ष्वाकु वंश), वायु ८८.६१/२.२६.६१(धुन्धु असुर की मुखाग्नि से बचे कुवलाश्व के ३ पुत्रों में से एक ) । dridhaashva

 

 

 

दृढास्य मत्स्य २०२.११ (अगस्त्य - पुत्र, पुलह द्वारा पुत्र रूप में वरण), विष्णुधर्मोत्तर १.११८.११ (दृढस्यु : अगस्त्य - पुत्र, पुलह - पुत्र बनना ) ।

 

 

 

दृश्य ब्रह्माण्ड १.२.२४.२८(दृश्यामेघा : सूर्य की हिमसर्जक रश्मियों में से एक), भागवत ३.५.२४(माया की सृष्टि से पूर्व दृश्य के अभाव तथा माया के दर्शन करने वाली शक्ति होने का कथन), योगवासिष्ठ ३.१.२२(द्रष्टा व दृश्य की सत्ता के बन्ध होने का वर्णन, दृश्य की परिभाषा ) drishya

 

 

 

दृषत् गरुड १.१०७.३५(मृत विप्र के दाह हेतु चिता निर्माण के संदर्भ में उर पर दृषद रखने का उल्लेख), पद्म ३.२६.८३ (दृषत्पान तीर्थ का माहात्म्य), ब्रह्माण्ड २.३.६३.२७(दृषदश्व : पृथु - पुत्र, अन्ध्र - पिता, इक्ष्वाकु वंश ) । drishat

 

 

 

दृषद्वती पद्म ३.२६.९० (दृषद्वती - कौशिकी सङ्गम का माहात्म्य), ब्रह्म १.९.४९ (दिवोदास व दृषद्वती से प्रतर्दन की उत्पत्ति), ब्रह्माण्ड २.३.६३.६५(संहताश्व की एक रानी, प्रसेनजित् - माता), २.३.६३.७५(हर्यश्व - पत्नी, सुमति - माता), २.३.६७.६७(दिवोदास - पत्नी, प्रतर्दन - माता), २.३.७४.१८(उशीनर की ५ रानियों में से एक, शिबि - माता), मत्स्य ४८.१६(उशीनर की ५ रानियों में से एक, शिबि - माता), वामन २२.४६(नदी, सरस्वती व दृषद्वती के मध्य कुरुक्षेत्र की स्थिति), ३६.४६(दृषद्वती नदी में स्नान व तर्पण का फल), वायु ९१.१०३/२.२९.९९ (विश्वामित्र - भार्या, अष्टक - माता, माधवी से साम्य?), ९२.६४(दिवोदास - पत्नी, प्रतर्दन - माता), ९९.२१ (उशीनर - पत्नी , उशीनर शिबि - माता), ९९.२५८, २७०(अधिसोमकृष्ण के २ वर्षीय यज्ञ का स्थान), विष्णुधर्मोत्तर १.२१५.५१ (दृषद्वती का चाष वाहन से विष्णु के समीप गमन), हरिवंश १.१२.४(हिमवान् - पुत्री, संहताश्व - भार्या, प्रसेनजित् - माता), १.२९.७२ (दिवोदास - पत्नी , प्रतर्दन - माता), महाभारत आश्वमेधिक ९२ दाक्षिणात्य पृष्ठ ६३६१(सरस्वती व दृषद्वती नदियों के बीच के देश के ब्रह्मावर्त नाम होने का उल्लेख ) । drishadvati/ drishadvatee

 

Short remarks by Dr. Fatah Singh

 

अनेकधा विभक्त सत्य का नाम दृषद् है । ऐसी चेतना दृषद्वती है ।

 

 

 

दृष्ट -  ब्रह्माण्ड ३.४.२१.८६(दृष्टकेतु : भण्ड के सेनापतियों में से एक), ३.४.२१.८६(दृष्टहास : भण्ड के सेनापति पुत्रों में से एक), विष्णु ४.१४.९ (दृष्टधर्म : उपमद्गु के १३ पुत्रों में से एक ) ।

 

 

 

दृष्टि ब्रह्मवैवर्त्त ३.४.४२(दृष्टि सौन्दर्य हेतु रत्नप्रदीप दान का निर्देश), ब्रह्माण्ड ३.४.३७.४२(दृष्टिदेवी : ललिता देवी की समीपवर्तिनी ६ शक्ति देवियों में से एक), भविष्य १.१३२.२९(देव प्रतिमा में ऊर्ध्वदृष्टि अन्धत्व व अधोदृष्टि चिन्ता का प्रतीक होने का उल्लेख), शिव ६.१६.४९(ज्ञान, क्रिया, इच्छा के शिव की दृष्टित्रय होने का उल्लेख ), महाभारत उद्योग १६.२६(नहुष की दृष्टि में विष होने का कथन), भरतनाट्य ८.३७(३६ दृष्टियों के लक्षण) drishti

 

देव अग्नि ५१ (देव गण की प्रतिमाओं के रूप), ६६ (देवगण की प्रतिष्ठा विधि), गणेश १.१.२३ (देवनगर : सौराष्ट्र के देवनगर में राजा सोमकान्त की कथा), गरुड १.४८ (देवों की प्रतिष्ठा की विधि), नारद १.५६.५२४ (देव प्रतिष्ठा हेतु काल का विचार), १.३७(१४ मन्वन्तरों के देवताओं का कथन), १.६७(देवपूजा का निरूपण), पद्म १.७६.१०३(मनुष्य रूप में अवतीर्ण देवों के लक्षण, भीष्म, द्रोण, पाण्डवादि के देवत्व का कथन), ३.५७.३८(भिन्न - भिन्न कामना से भिन्न - भिन्न देवों की आराधना), ६.१६६ (देव तीर्थ का माहात्म्य : नकुल द्वारा पाण्डुरार्या देवी की स्थापना, हनुमान को प्लवन शक्ति की प्राप्ति), ब्रह्म २.५७(देवतीर्थ के प्रभाव का वर्णन), भविष्य ४.७०(देव शयन उत्थापन द्वादशी व्रत का वर्णन), ४.१७५.५३(तुला पुरुष दान विधि के अन्तर्गत विभिन्न देवों के आवाहन मन्त्र), मत्स्य १०१.३ (देव व्रत का विधान व माहात्म्य), २९०.४(छठें कल्प का नाम), मार्कण्डेय ८२/७९ (महिषासुर से परास्त देवगण का शिव एवं विष्णु की शरण में गमन, देवों के शरीर से नि:सृत तेज से देवी का प्रादुर्भाव, देवी के महिषासुर सेना से युद्ध का वर्णन), वायु ९.१(देवादि की सृष्टि का वर्णन), ३१.१(देव वंश का वर्णन), ५८.१२३(देवों के ८ प्रकारों का उल्लेख), ९१.९६/२.२९.९२(विश्वामित्र के पुत्रों में से एक), ९६.११२/२.३४.११२(अक्रूर व उग्रसेनी के पुत्रों में से एक), ९६.१२९/२.३४.१२९( देवक के पुत्रों में से एक ; देवक की देवा अन्त्य प्रत्यय वाली ७ कन्याओं के नाम), विष्णु ३.१ (मन्वन्तरानुसार देवों का कथन), विष्णुधर्मोत्तर २.९०(देव अर्चा मन्त्र प्रतीक कथन), २.९१(देवपूजा में देव को निवेदनीय वस्तुओं की योग्यता, अयोग्यता का विचार ) ३.१०४+ (ब्रह्मादि देवों के आवाहन मन्त्रों का कथन), ३.२८८(देव पूजा महिमा व फल का वर्णन), शिव ३.५.१५(१६वें द्वापर में व्यास का नाम), स्कन्द १.१.२७.४५ (कुमार कार्तिकेय जन्म प्रसङ्ग में अग्नि द्वारा मुख में शिव वीर्य धारण करने पर देवों का सगर्भ होना, शिव के निर्देश पर वमन से पीडा से मुक्ति), २.१.१ (देव तीर्थ का माहात्म्य), ३.१.४२ (देव तीर्थ का माहात्म्य), ३.१.४९.८५ (देवों द्वारा रामेश्वर की स्तुति), ५.१.४८.१५(मानुष मान से संवत्सर का देवों का दिन व रात्रि होना), ५.२.६४.२३(देवों को पशुभाव की प्राप्ति, महाकालवन में पशुपतीश्वर के दर्शन से पशुत्व से मुक्ति), ५.३.३७ (देव तीर्थ का माहात्म्य : नर्मदा तट पर देवों के तप का स्थान), ५.३.१३० (देव तीर्थ का माहात्म्य), ५.३.१९५.३(देवतीर्थ का माहात्म्य), ५.३.२०१ (देव तीर्थ का माहात्म्य), ५.३.२३१.१५(देवतीर्थों की ५ संख्या), ६.१९२ (ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री द्वारा देवों को शाप), ६.२४६ (शिव - पार्वती रति में विघ्न डालने के कारण पार्वती द्वारा देवों को शिला बनने का शाप, बिल्व व तुलसी वृक्षों के दर्शन से मुक्ति), ६.२५१ (पार्वती के शाप से देवों का शालग्राम शिला बनना), ७.१.१७.७२ (देव पूजा मन्त्र), महाभारत वन ५७.२४ (दमयन्ती द्वारा देवों के लिङ्गों/लक्षणों का अभिज्ञान), अनुशासन ९८.२८(देवों हेतु उपयुक्त पुष्प), लक्ष्मीनारायण २.११२.४(देवों को वास प्रदान से नदियों की तीर्थरूपता), २.१५३(देव होम निरूपण), २.१५७.१७(शरीराङ्गों में देवों का न्यास), २.१६०.६९ (देवों के लिए देय अन्न), २.२५४.५(देव तोषण का वर्णन), ३.२५.१ (देव वत्सर में प्रसविष्णु असुर द्वारा लक्ष्मी प्राप्त करने का वृत्तान्त), ३.३५.६१ (चातुर्मास यज्ञ में देवों को देय द्रव्य), ४.५२.५३(देवद्रोह के दुष्परिणाम, देवों की तुष्टि का निर्देश ) । deva

 

 

 

देव - गर्ग ५.१२.१३(देवयक्ष नामक यक्ष के आठ पुत्रों द्वारा पूजा के पुष्पों को दूषित करने पर पिता द्वारा पुत्रों को शाप), ५.१७.२३(देवाङ्गना : कृष्ण विरह पर देवाङ्गनाओं द्वारा व्यक्त उद्गार), देवीभागवत १.१९.४१(देवश्रुत : शुकदेव व पीवरी - पुत्र), पद्म ६.६.२३(देवनदी : बल असुर के एक अङ्ग के देवनदी में गिरने का उल्लेख), ब्रह्म २.९०(देवागम/देवप्रिय तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन), ब्रह्माण्ड १.२.३३.१२(देववर : चरकाध्वर्युओं में से एक), १.२.३५.५७(देवदर्श : अथर्ववेदी कबन्ध का शिष्य, संहिता के भाग कर चार शिष्यों को देना), १.२.३६.३९(देवाम्बुज : उत्तम मनु के १३ पुत्रों में से एक), ३.४.७.३१, ३७(देवव्रात : काष्ठहार द्वारा देवव्रात पुरोहित ब्राह्मण के प्रतिष्ठार्थ देवरात नगर की स्थापना), भविष्य ३.३.५.३ (देवपाल : अनङ्गपाल द्वारा कान्यकुब्ज - अधिपति देवपाल को चन्द्रकान्ति नामक स्वकन्या प्रदान करना), ३.४.८.७० (सूर्योपासना से देवयाजी ब्राह्मण के मृत पुत्र का पुनरुज्जीवन, पुत्र द्वारा विवस्वान् नाम धारण की कथा), भागवत ५.२.२३(देववीति : मेरु - कन्या, केतुमाल से विवाह), ५.१५.३(देवद्युम्न : देवताजित् व आसुरी - पुत्र, धेनुमती - पति, परमेष्ठी - पिता, ऋषभ वंश), ५.१९.१६(देवगिरि : भारत के पर्वतों में से एक), ५.२०.९ (देववर्ष : शाल्मलि द्वीप के ७ भागों में से एक), ५.२०.२६(देवपाल : शाक द्वीप के ७ पर्वतों में से एक सीमा पर्वत), ६.६.५(देवऋषभ : धर्म व भानु - पुत्र), ८.१३.१७(देवगुह्य : सरस्वती - पति, सार्वभौम हरि - पिता), ९.२४.२२ (देववर्द्धन : देवक के ४ पुत्रों में से एक, देवकी आदि ७ भगिनियां), मत्स्य ४६.२(देवमार्ग : शूर व भोजा के १० पुत्रों में से एक), १९६.२८(देवमति : आङ्गिरस वंश में त्र्यार्षेय प्रवर्तक ऋषि), १९६.४३(देवजिह्व : आंगिरस कुल का एक त्र्यार्षेय प्रवर ऋषि), वराह १४५.७५(देवह्रद : शालग्राम क्षेत्र के अन्तर्गत एक तीर्थ क्षेत्र, माहात्म्य), वायु ४२.४६(देवभ्राज : गङ्गा द्वारा प्लावित वनों में से एक), ६३.१५/२.२.१५(उत्तम मन्वन्तर में देवभुज द्वारा वैराज गौ के दोहन का उल्लेख), ९६.१२९/२.३४.१२९(देवरञ्जित : देवक के पुत्रों में से एक), विष्णु ३.६.९(देवदर्श : कबन्ध - शिष्य, देवदर्श के ४ शिष्यों के नाम), स्कन्द ५.१.६८ (देवप्रयाग तीर्थ का माहात्म्य : आनन्द भैरव की उपस्थिति), ५.३.१६९.५ (राजा, प्रमोदिनी नामक कन्या के श्येन रूप धारी शम्बर द्वारा हरण की कथा), लक्ष्मीनारायण १.३११.९८(देवयुति दासी के अभिजित् नक्षत्र बनने का कथन), १.३१३.२(देवयव : देवजुष्टा - पति देवयव ब्राह्मण द्वारा देवद्रव्य का हरण करने से भृत्यों सहित दुःख में पडना, अधिक मास की षष्ठी व्रत से जन्मान्तर में महेन्द्र अद्रि बनना), २.७४.४२(देवप्रिय विप्र व उसकी पत्नी द्युमती द्वारा अशुचि अवस्था में देवपूजा से जन्मान्तर में मार्जार व अन्त्यज योनियों की प्राप्ति), २.२७०.६५(देवमूल - कन्या अमरा द्वारा विष्णु की आराधना, विष्णु द्वारा अमरा का विवाह विधि से ग्रहण), ३.५.९६(देववीथि : द्यु - पुत्री देववीथि के रूप में श्री/लक्ष्मी का एक अवतार), ३.३४.७६(देवपुष्प : पुण्यवती - पति, पुण्यवती द्वारा ब्रह्मा को शाप देने का वृत्तान्त), ३.१९४.२(देवविश्राम : चक्रधर नृप का अमात्य, हरि कृपा से स्त्री हत्या के पाप से मुक्ति की कथा), ४.७२(देवमतीश्वर : भार्या सहित मोक्ष प्राप्ति की कथा), ४.१०१.११७(देवता : कृष्ण - पत्नी, देवेश्वर व दिवस्पदा युगल की माता), कथासरित् २.५.६९(देवस्मिता : धर्मगुप्त वैश्य की कन्या, गुहसेन से विवाह), ९.४.१८(देवसिद्धि : देवताओं की सिद्धि प्राप्त एक दिव्य पुरुष, बलाहक पर्वत पर निवास), ९.४.२२६(देवबल : चमरवाल - सेनापति), ९.५.५६(देवशक्ति : कुण्डिनपुर - राजा, अनन्तशक्ति - पति, मदनसुन्दरी - पिता), ९.६.५(चन्द्रस्वामी ब्राह्मण - पत्नी, महीपाल - माता), १२.६.५७(देवदर्शन : शाप मुक्त होने पर अट्टहास नामक यक्ष व यक्षिणी द्वारा स्वपुत्र का पुत्रहीन देवदर्शन ब्राह्मण के गृह में स्थापन), १४.४.१९७(देवमाय : त्रिशीर्ष नामक गुहा के द्वार पर नियुक्त एक वीर), १५.१.४६(त्रिशीर्ष नामक गुफा का रक्षक एक राजा, नरवाहनदत्त द्वारा बन्धन स्वीकार, अनन्तर मुक्ति), १७.१.८४(देवसोम : यज्ञसोम - पुत्र, हरिसोम - भ्राता, मांस भक्षण से मामा द्वारा ब्रह्मराक्षस होने का शाप), १७.५.८(देवसभ : मेरुध्वज नामक चक्रवर्ती राजा द्वारा शासित एक नगर ) ; द्र. उपदेव, चिरन्देव, जयदेव, बलदेव, ब्रह्मदेव, महादेव, वसुदेव, शक्तिदेव, श्राद्धदेव, श्रुतदेव, सत्यदेव, सहदेव, सुदेव । deva

 

 

 

देवक गर्ग १.५.२३ (ध्रुव वसु का अंश), देवीभागवत ४.२२.३५(गन्धर्वपति का अंश), ब्रह्म १.१३.५५(आहुक के दो पुत्रों में से एक, उग्रसेन - भ्राता, देववान् प्रभृति ४ पुत्रों तथा देवकी प्रभृति ७ पुत्रियों के पिता), ४.७.७(आहुक - पुत्र, पुत्री देवकी का विवाह वसुदेव से करने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड २.३.७१.१२९(आहुक - पुत्र, उग्रसेन - भ्राता, पुत्रों के नाम), भागवत ९.२२.३०(युधिष्ठिर व पौरवी - पुत्र), ९.२४.२१(देवक के ४ पुत्रों व ७ पुत्रियों के नाम), मत्स्य ४४.७१(आहुक - पुत्र, उग्रसेन - भ्राता, पुत्रों के नाम), वायु ९६.१२८/२.३४.१२८(आहुक - पुत्र, उग्रसेन - भ्राता, पुत्रों के नाम), विष्णु ४.१४.१६(आहुक - पुत्र, उग्रसेन - भ्राता, पुत्रों के नाम), ४.२०.४४(युधिष्ठिर व यौधेयी - पुत्र), ५.१.५(देवक - सुता देवकी के वसुदेव से विवाह का उल्लेख ) । devaka

 

 

 

देवकी गरुड ३.२९.२४(यम व कलि-भार्या श्यामला का देवकी रूप में अवतरण) देवीभागवत ४.१.४(कंस द्वारा देवकी के छह पुत्रों का वध विषयक प्रश्न), ४.२०.७२ (आकाशवाणी सुनकर कंस द्वारा देवकी के वध की चेष्टा), ४.२२.२१ (कंस द्वारा मारे गए ६ देवकी - पुत्रों के पूर्व जन्म का वृत्तान्त), ७.३०.७० (मथुरा में विराजमान देवी का नाम), १२.११.९ (६४ कला नामों के अन्तर्गत एक नाम), ब्रह्म १.१३.५७(देवक की ७ पुत्रियों में से एक, वसुदेव - पत्नी), १.७२.३३(नारद का कंस के प्रति देवकी के आठवें गर्भ से मृत्यु प्राप्ति का कथन, कंस द्वारा वसुदेव व देवकी का कारागार में स्थापन, देवकी के छह पुत्रों का कंस द्वारा वध) ब्रह्मवैवर्त्त ४.६.१४१(देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में जाकर अनन्त की उत्पत्ति), ४.७.७(देवक - कन्या देवकी का वसुदेव से विवाह, कंस द्वारा देवकी के वध की चेष्टा, देवकी से कृष्ण जन्म का वृत्तान्त आदि), भविष्य ३.३.१.३३(देवकी से कृष्णांश उदयसिंह की उत्पत्ति), ३.३.८.४(गोपालक राष्ट्र - भूपति दलवाहन द्वारा स्वकन्या देवकी को देशराज को प्रदान करना), ४.४६(लोमश मुनि द्वारा मृतवत्सा देवकी से स्थिर संतान प्राप्ति हेतु मुक्ताभरण सप्तमी व्रत के माहात्म्य का वर्णन), ४.१९२ (नारद द्वारा देवकी को नक्षत्र दान / दान द्रव्य का वर्णन), भागवत १०.१.२९ (सूर्या का विशेषण), १०.३.३२ (जन्मान्तर में पृश्नि व अदिति), ११.३१.१८(कृष्ण के स्वर्गगमन पर देवकी द्वारा विरह में प्राण त्यागने का उल्लेख), मत्स्य १३.३९(मथुरा में सती देवी की देवकी नाम से स्थिति का उल्लेख), ५०.५६(युधिष्ठिर - भार्या, यौधेय - माता), वायु ९६.१७३/ २.३४.१७३(कंस द्वारा हत वसुदेव व देवकी के ६ पुत्रों के  नाम), विष्णु ५.१.५ (वसुदेव के विवाह के अवसर पर कंस द्वारा देवकी के वध की चेष्टा), ५.२ (कृष्ण को गर्भ में धारण करने पर देवों द्वारा देवकी की स्तुति), ५.३८.४(वसुदेव व उनकी देवकी आदि पत्नियों के अग्नि प्रवेश का कथन), स्कन्द ५.३.१९८.७६ (मथुरा में देवी की देविका नाम से स्थिति ) । devakee/ devaki

 

 

 

देवकुल्या भागवत ४.१.१४ (पूर्णिमा - पुत्री, गङ्गा में रूपान्तरण), ५.१५.६(उद्गीथ व देवकुल्या से प्रस्ताव के जन्म का उल्लेख ) ।

 

 

 

देवकूट ब्रह्म १.१६.४६(मेरु के दक्षिणोत्तर मर्यादा पर्वतों में से एक), ब्रह्माण्ड २.३.७.४५२(गरुडों से व्याप्त पर्वतों में से एक), भागवत ५.१६.२७(मेरु मूल के पूर्व का एक पर्वत), लिङ्ग १.५१.१ (देवकूट पर्वत का वर्णन , देवकूट पर्वत पर शिव का वास), वायु  ३५.८(मेरु के पूर्व में स्थित २ पर्वतों में से एक), ४०१ (वैनतेय गरुड का देवकूट पर्वत पर जन्म व वास स्थान ) ; द्र. भूगोल । devakoota/ devakuuta/ devkuta

 

 

 

देवकृतञ्जय वायु २३.१७४/१.२३.१६३(१७वें द्वापर में व्यास), शिव ३.५.१८(१७वें द्वापर में व्यास का नाम ) ।

 

 

 

देवक्षेत्र ब्रह्माण्ड २.३.७०.४५(देवरात - पुत्र, देवन - पिता, मरुत्त वंश), भागवत ९.२४.५(देवक्षत्र  : देवरात - पुत्र, मधु - पिता, विदर्भ वंश), मत्स्य ४४.४३ (देवक्षत्र : देवरात - पुत्र, मधु - पिता, मरुत्त वंश), वायु ९५.४४/ २.३३.४४ (देवरात - पुत्र, देवन - पिता, मरुत्त वंश), विष्णु ४.१२.४२(देवरात - पुत्र, मधु - पिता ) । devakshetra

 

देवखात स्कन्द ३.२.१५.७०(सरोवर, माहात्म्य का कथन), ७.३.४५ (देवखात तीर्थ का माहात्म्य ) । devakhaata

 

 

 

देवगर्भ पद्म १.३४.१४ (ब्रह्मा के यज्ञ में उद्गाता), भागवत ५.२०.१५(देवगर्भा : कुश द्वीप की ७ नदियों में से एक), विष्णु ४.१४.२४(हृदिक के पुत्रों में से एक, शूर - पिता ) ।

 

 

 

देवजनी ब्रह्माण्ड २.३.७.१२१, १२७(क्रतुस्थ - पुत्री, मणिवर यक्ष - पत्नी, पुत्रों के नाम), वायु ६९.१५३/२.८.१४८(क्रतुस्थली - पुत्री, मणिभद्र - पत्नी, पुत्रों व कन्याओं के नाम), विष्णुधर्मोत्तर १.१९७ (वीरभद्र - भार्या ) । devajanee

 

 

 

देवजुष्टा लक्ष्मीनारायण १.३१३.३, १०३(देवयव विप्र की पत्नी, पति द्वारा देवद्रव्य का हरण करने पर दुःखों की प्राप्ति, पुरुषोत्तम मास की षष्ठी व्रत के प्रभाव से महेन्द्र व महेन्द्राणी बनना ) ।

 

 

 

देवजय कथासरित् १०.३.१२३(विद्याधर, मनोरथप्रभा को सिंहविक्रम का सन्देश ) ।

 

 

 

देवता अग्नि ३८(देव - मन्दिरों के निर्माण से प्राप्त फल का वर्णन), कूर्म १.२२.४२ (नृप, विप्र, गन्धर्व आदि विभिन्न वर्गों/योनियों के लिए देवताओं के नाम), भागवत ५.१५.२(देवताजित् : सुमति व वृद्धसेना - पुत्र), योगवासिष्ठ ६.१.४०(देवता तत्त्व विचार नामक सर्ग में पूज्य, पूजक, पूजा अभिन्नता आदि का विचार ), द्र. देव । devataa

 

 

 

देवदत्त अग्नि ८८.४(शान्त्यतीत कला/तुर्यातीत के २ प्राणों में से एक, कुहू? नाडी में स्थित देवदत्त वायु की प्रकृति का कथन), २१४.१३(देवदत्त वायु के विजृम्भा का हेतु होने का उल्लेख), देवीभागवत ३.१०.१८ (देवदत्त द्विज द्वारा तमसा तट पर पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन, गोभिल के शाप से मूर्ख पुत्र उतथ्य की प्राप्ति), भागवत ५.१४.२४(लौकिक धन के देवदत्त द्वारा हरण का उल्लेख), ५.२४.३१(पाताल के प्रमुख नागों में से एक), ६.९.२०(भगवान् के देवदत्त की भांति गुण के कार्य रूप जगत् में प्रकट हो जाने का उल्लेख), ९.२.२०(उरुश्रवा - पुत्र, अग्निवेश्य - पिता), १२.२.१९(कल्कि के घोडे का नाम), वराह १४६.५(प्रम्लोचा अप्सरा द्वारा देवदत्त द्विज के तप में विघ्न, देवदत्त व प्रम्लोचा की कन्या रुरु की तपस्या का वृत्तान्त), कथासरित् १.७.५१(गोविन्ददत्त व अग्निदत्ता के ५ पुत्रों में से एक, पिता द्वारा तिरस्कृत होने पर तप, तप से सन्तुष्ट शिव द्वारा विद्याध्ययन का आदेश), ४.१.५४(जयदत्त - पुत्र, देवदत्त की वेश्या - पत्नी की कथा), ५.३.१९५(द्विज, हरिदत्त - पुत्र, देवदत्त द्वारा विद्याधर - राज्य प्राप्ति की कथा), १०.८.३(देवदत्ता : देवशर्मा - भार्या ) । devadatta/devdatta

 

 

 

देवदारु कूर्म २.३७.५३+ (देवदारु वन का माहात्म्य : पार्वती रूपी नारायण का लिङ्गी शिव सहित दारुवन में विचरण, ऋषियों का मोहन व शाप), पद्म ६.२०३.२१ (शिवगण कुम्भोदर द्वारा पार्वती के पुत्रवत् प्रिय देवदारु वृक्ष की त्वचा का उत्पाटन, पार्वती शाप से सिंह बनना), मत्स्य १३.४७(देवदारु वन में सती के पुष्टि नाम से वास का उल्लेख), वायु २३.१९५/१.२३/१८४(२१वें द्वापर में विष्णु के दारुक अवतार के कारण देवदारु वन की प्रसिद्धि का उल्लेख), १०८.६६/२.४६.६९ (गया में मुण्ड पृष्ठ के नितम्ब पर देवदारु वन की स्थिति का उल्लेख), स्कन्द ५.२.११(विप्रों का सिद्धि प्राप्ति हेतु देवदारु वन में तप, आकाशवाणी श्रवण से महाकालवन में गमन, सिद्धिप्रद लिङ्ग की स्थापना), ५.३.१९८.८४(देवी की देवदारु वन में पुष्टि नाम से स्थिति ) । devadaaru/ devdaru

 

 

 

देवदास पद्म ५.९५.१४० (हेमकार, वैशाख मास माहात्म्य से जन्मान्तर में अम्बरीष बनना), ६.२१६ (विप्र, उत्तमा - पति, अङ्गद व वलया - पिता, बदरी तीर्थ में मुक्ति), कथासरित् ३.५.१६(देवदास वैश्य तथा उसकी परपुरुषगामी स्त्री की कथा), ६.१.८९(राजा धर्मदत्त का पूर्वजन्म में देवदास होना), १०.२.६७(दु:शीला - पति, चरित्रहीना पत्नी के षडयन्त्र से मृत्यु ) । devadaasa/ devdasa

 

 

 

देव - दैत्य ब्रह्मवैवर्त्त २.१९(शङ्कर व शङ्खचूड का युद्ध), वामन ६९(प्रमथों व देवों के साथ दानवों का युद्ध), ७३(बलि, मय प्रभृति दैत्यों का देवों के साथ युद्ध, कालनेमि का विष्णु से युद्ध, विष्णु द्वारा कालनेमि का वध), विष्णुधर्मोत्तर १.४३(विष्णु द्वारा राहु के शिर छेदन से क्रुद्ध दैत्यों का देवों के साथ युद्ध, दैत्यों की पराजय), १.१३०(वैवस्वत मन्वन्तर के प्रथम द्वापर में दैव - दैत्यों के युद्ध का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.३३७.३९(शङ्खचूड व शिव के युद्ध में देवों और असुरों के युद्ध का वर्णन ) ; द्र. देवासुर सङ्ग्राम । deva - daitya

 

 

 

देवद्युति पद्म ६.१२८.१८६ (विप्र, सुमित्र - पुत्र, तप, विष्णु की स्तुति), ६.१२९ (देवद्युति द्वारा पिशाच योनि प्राप्त चित्र राजा को माघ स्नान माहात्म्य का कथन ) । devadyuti

 

 

 

देवन ब्रह्माण्ड २.३.७०.४५(देवक्षत्र - पुत्र, मधु - पिता, मरुत्त वंश), मत्स्य १२२.८०(क्रौञ्च द्वीप का एक पर्वत ) ।

 

 

 

देवप्रभ वराह १४५.६३(शालग्राम क्षेत्र के अन्तर्गत एक तीर्थ क्षेत्र, माहात्म्य), कथासरित् ७.२.११३(गन्धर्व, सोमप्रभ - भ्राता, सिंह शाप से अगले जन्म में रत्नाधिपति राजा बनना), १७.४.१७७(देवप्रभा : सिद्धकन्या, गन्धर्वराज चन्द्रकेतु की कन्या पद्मावती को शाप प्रदान ) । devaprabha

 

 

 

देवप्रहरण मत्स्य ६.६(कृशाश्व के पुत्रों की देवप्रहरण नाम से प्रसिद्धि), वायु ६६.७९(कृशाश्व - पुत्र), विष्णु १.१५.१३६(शास्त्रों के अभिमानी देवगण, कृशाश्व की संतति ) । devapraharana

 

 

 

देवबाहु ब्रह्माण्ड १.२.११.२७(प्रीति व पुलस्त्य के ३ पुत्रों में से एक), १.२.३६.६१(रैवत मन्वन्तर के सप्तर्षियों में से एक), २.३.७१.१४१(हृदीक के १० पुत्रों में से एक, कम्बलबर्हिष - पिता), भागवत ९.२४.२७(हृदीक के ३ पुत्रों में से एक), वायु २८.२२(प्रीति व पुलस्त्य के ३ पुत्रों में से एक ) । devabaahu

 

 

 

देवभाग ब्रह्माण्ड २.३.७१.१४९, १८८(शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक), भागवत ९.२४.२८(शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक), ९.२४.४०(कंसा - पति, चित्रकेतु व बृहद्बल - पिता), वायु ९६.१४७/२.३४.१४४(शूर व भाषी के १० पुत्रों में से एक), विष्णु ४.१४.३०(शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक, आनकदुन्दुभि - भ्राता ) । devabhaaga

 

 

 

देवभूति ब्रह्माण्ड २.३.७४.१५५(देवभूमि : भागवत - पुत्र, १० शुङ्ग राजाओं में अन्तिम), भागवत १२.१.१८(भागवत - पुत्र, १२ शुङ्ग राजाओं में अन्तिम, कलियुगी राजा प्रसंग), मत्स्य २७२.३१(देवभूमि : समाभाग - पुत्र, १० शुङ्ग राजाओं में अन्तिम), वायु ९९.१४४/२.३७.३३८(देवभूमि : १० शुङ्ग राजाओं के पश्चात् देवभूमि राजा का उल्लेख), विष्णु ४.२४.३६( भागवत - पुत्र, शुङ्गवंशी राजाओं में अन्तिम ; मन्त्री द्वारा देवभूति के वध का कथन), कथासरित् १२.५.२०५(ब्राह्मण, भोगवती - पति, नगरपाल के निर्णय से दुःखी होकर प्राण त्याग ) । devabhooti/devabhuuti/ devbhuti

 

 

 

देवमाता मत्स्य १३.४४(सरस्वती में सती देवी के देवमाता नाम से वास का उल्लेख), स्कन्द ७.१.४१ (बडवानल का वहन करने से सरस्वती द्वारा प्राप्त नाम ) ।

 

 

 

देवमित्र ब्रह्माण्ड १.२.३४.३३ (शाकल्य ऋषि का नाम, जनक सभा में याज्ञवल्क्य से विवाद में मृत्यु), १.२.३५.१(देवमित्र द्वारा पांच संहिताओं का निर्माण, मुद्गल आदि ५ शिष्य), भागवत १२.६.५६(माण्डण्केय - शिष्य , सौभरि आदि को संहिता की शिक्षा), वायु ६०.३२(शाकल्य देवमित्र द्वारा ५ शिष्यों हेतु ५ संहिताओं के निर्माण का उल्लेख ) । devamitra

 

 

 

देवमीढ ब्रह्मवैवर्त्त ४.७.५(वसुदेव - पिता, मारिषा - पति), ब्रह्माण्ड २.३.६४.१२(कीर्तिरथ - पुत्र, विबुध - पिता, जनक वंश), भागवत ९.१३.१६(कृतिरथ - पुत्र, विश्रुत - पिता), वायु ८९.१२/२.२७.१२(कीर्तिरथ - पुत्र, विबुध - पिता, जनक वंश), विष्णु ४.५.२७(कृतरथ - पुत्र, विबुध - पिता, जनक वंश ) । devameedha/ devmeedha

 

 

 

देवमीढुष ब्रह्माण्ड २.३.७१.१४५(शूर का विशेषण ?), मत्स्य ४५.२(वृष्णि व माद्री के पुत्रों में से एक), वायु ९६.१४३/२.३४.१४३(शूर व माष्या - पुत्र ? )

 

 

 

देवयान - पितृयान  भागवत ७.१५.५५ (देवयान - पितृयान मार्ग का वर्णन), वायु ५०.२१७ (देवयान - पितृयान मार्ग का कथन), विष्णु २.८.८५ (देवयान - पितृयान मार्ग का वर्णन ) । devayaana

 

 

 

देवयानी देवीभागवत ८.४.२७ (शुक्राचार्य व ऊर्जस्वती - पुत्री), १२.६.७६ (गायत्री सहस्रनामों में से एक), पद्म  २.८०.२(ययाति - पत्नी, अश्रुबिन्दुमती नामक सपत्नी के प्रति दुष्ट भाव की प्राप्ति), भागवत ५.१.३४(शुक्राचार्य व ऊर्जस्वती - कन्या), ९.१८ (देवयानी की शर्मिष्ठा से कलह, देवयानी का कूप में पतन, ययाति से परिणय), मत्स्य २५.७ (शुक्राचार्य - पुत्री, देवयानी के आग्रह पर शुक्राचार्य द्वारा कच के पुन: संजीवन का उद्योग), २६.१ (देवयानी द्वारा कच से पाणिग्रहण का अनुरोध, कच की अस्वीकृति पर शाप - प्रतिशाप), २७.६ (देवयानी की शर्मिष्ठा से कलह, कूप में पतन, ययाति द्वारा कूप से उद्धार), ३२.१ (शर्मिष्ठा व ययाति से पुत्र उत्पत्ति का ज्ञान होने पर देवयानी का रोष, पिता शुक्र के पास गमन), ४७.१८६ (जयन्ती व शुक्राचार्य से देवयानी की उत्पत्ति), वायु ६५.८४(यजनी/जयन्ती नामक पत्नी से शुक्र - पुत्री देवयानी की उत्पत्ति), लक्ष्मीनारायण १.४०७.८०(इन्द्र - पुत्री जयन्ती व शुक्राचार्य से देवयानी कन्या के जन्म का कथन ) । devayaani/devayaanee/ devyani

 

 

 

देवरक्षित ब्रह्म १.१३.५६(देवक के ४ पुत्रों में से एक, देवकी - भ्राता), ब्रह्माण्ड २.३.७१.१३०(देवक के पुत्रों में से एक, देवकी - भ्राता), मत्स्य ४४.७२(देवक के पुत्रों में से एक, देवकी - भ्राता), विष्णु ४.१४.१७(देवक के ४ पुत्रों में से एक), कथासरित् १४.४.२८(करभक ग्राम निवासी देवरक्षित ब्राह्मण द्वारा पालित कपिला गौ द्वारा गोमुख की योगिनियों से रक्षा ) । devarakshita

 

 

 

देवरक्षिता ब्रह्म १.१३.५७(देवक की ७ पुत्रियों में से एक, देवकी - भगिनी), भागवत ९.२४.२३(देवक की ७ पुत्रियों में से एक, देवकी - भगिनी), ९.२४.५२(वसुदेव - पत्नी, गद आदि ९ पुत्रों की माता), मत्स्य ४६.१६(उपासंगधर - माता), विष्णु ४.१४.१८(देवकी की ७ पुत्रियों में से एक, देवकी - भगिनी), हरिवंश १.३५.२(वसुदेव की १४ पत्नियों में से एक, उपासंगवर - माता ) । devarakshitaa

 

 

 

देवराज शिव १.२.१६(किरात नगर वासी दुष्ट ब्राह्मण देवराज द्वारा शिव पुराण कथा श्रवण से मृत्यु उपरान्त शिव लोक में जाने की कथा), स्कन्द ७.१.२१७ (देवराजेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य ) ।

 

 

 

देवरात पद्म १.३४ (ब्रह्मा के यज्ञ में पोता), ५.११२(शिव नाम माहात्म्य के वर्णन के अन्तर्गत देवरात - सुता कला का वृत्तान्त), ब्रह्माण्ड १.२.३२.११७(१३ श्रेष्ठ कौशिक ऋषियों में से एक), २.३.६४.८(सुकेतु - पुत्र, बृहदुक्थ - पिता, जनक वंश), २.३.६६.६७(शुन:शेप द्वारा देवरात नाम प्राप्ति के कारण का कथन : देवों द्वारा विश्वामित्र को दत्त), २.३.७०.४४(करम्भ धन्वी - पुत्र, देवक्षत्र - पिता), ३.४.७.३७(किरात द्विजवर्मा द्वारा देवायतन निर्माण के संदर्भ में काञ्चीपुर को प्रदत्त एक नाम), भागवत ९.१३.१४(सुकेतु - पुत्र, बृहद्रथ - पिता, जनक वंश), ९.१६ (विश्वामित्र के दत्तक पुत्र शुन:शेप का अपर नाम, भ्राताओं द्वारा ज्येष्ठ भ्राता रूप में स्वीकृति), ९.२४.५(करम्भि - पुत्र, देवक्षत्र - पिता, विदर्भ वंश), १२.६.६४(याज्ञवल्क्य - पिता), मत्स्य ४४.४२(करम्भ - पुत्र, देवक्षत्र - पिता), १४५.१११(१३ ब्रह्मिष्ठ कौशिकों में से एक), १९८.३(विश्वामित्र के वंश प्रवर में से एक), वराह ४१ (देवरात द्वारा वीरधन्वा को ब्रह्महत्या से मुक्ति हेतु द्वादशी व्रत का कथन), वायु ९१.९५(विश्वामित्र - पुत्र शुन:शेप की देवरात नाम से प्रसिद्धि), ९५.४३/२.३३.४३(करम्भक धन्वी - पुत्र, देवक्षत्र - पिता), ९६.१८५/ २.३४.१८२ (देवश्रवा - पिता),विष्णु ४.५.२५(सुकेतु - पुत्र, बृहदुक्थ - पिता, जनक वंश), ४.७.३७(शुन:शेप द्वारा देवरात नाम प्राप्ति के कारण का कथन : देवों द्वारा विश्वामित्र को दत्त), ४.१२.४१(करम्भि - पुत्र, देवक्षत्र - पिता), स्कन्द ५.२.२८.२२(मुनि, वीरधन्वा राजा द्वारा वध), ६.२९(विवस्त्रा स्त्री के दर्शन से देवरात मुनि का जल में रेत: स्खलन, मृगी द्वारा प्राशन, कन्या का जन्म, देवरात द्वारा वत्स ऋषि को कन्या प्रदान) ६.११४(देवरात विप्र के पुत्र क्रथ द्वारा नागपुत्र का हनन, क्रुद्ध नागों द्वारा क्रथ का भक्षण), लक्ष्मीनारायण १.५४४.७ (मृग रूप धारी तापसों की हत्या पर राजा वीरधन्वा द्वारा देवरात ऋषि से प्रायश्चित्त उपाय की पृच्छा), ३.२०८.१००(सागर नामक किरात का भक्ति से देवरात बनना ) । devaraata/ devrata

 

 

देवल गर्ग १.१९.२९(देवल मुनि द्वारा कुबेर - पुत्रों नलकूबर और मणिग्रीव को वृक्षरूप होने का शाप, कृष्ण दर्शन से स्व - स्वरूप प्राप्ति रूप शाप मुक्ति का कथन), पद्म १.६.२७(प्रत्यूष वसु - पुत्र, ऋभु - भ्राता), १.३४.१४ (ब्रह्मा के यज्ञ में आग्नीध्र ), १.५९.१३(लिङ्गार्थ पूजा हेतु दत्त वस्तुओं को ग्रहण करने  के कारण देवल/पुजारी के नरक में जाने का कथन), ५.१०.३७ (राम के अश्वमेध में पूर्व द्वार पर देवल व असित की स्थिति), ६.२०१+ (देवल द्वारा शरभ ब्राह्मण को पुत्र प्राप्ति के उपाय का कथन), ब्रह्मवैवर्त्त २.५२.११ (देवल द्वारा सुयज्ञ नृप से कृतघ्नता दोष का निरूपण), ४.१४.३५(एक मुनि), ४.३० (असित - पुत्र, रत्नमाला - पति, देवल को रम्भा का शाप, अष्टावक्र नाम प्राप्ति), ब्रह्माण्ड १.२.३२.११३(६ ब्रह्मवादी काश्यपों में से एक), २.३.३.२७(प्रत्यूष वसु - पुत्र, २ पुत्रों के पिता), २.३.८.३२ (एकपर्णा व असित मुनि - पुत्र, शाण्डिल्यों  में श्रेष्ठ), २.३.१०.१९ (एकपर्णा व असित - पुत्र), भविष्य ३.४.७.५४(देवल विप्र के पुत्र रूप में हरिभक्त रामानन्द का जन्म), ४.९२(देवल मुनि प्रोक्त रम्भा व्रत का वर्णन), भागवत ६.६.२०(कृशाश्व व धिषणा के ४ पुत्रों में से एक), ८.४.३(देवल द्वारा हूहू को मकर योनि में जन्म लेने का शाप), ११.१६.२८(भगवान् के धीरों में देवल होने का उल्लेख), मत्स्य ५.२७(प्रत्यूष वसु का पुत्र), २०.२६(देवल - कन्या सन्नति का पाञ्चाल नरेश ब्रह्मदत्त की पत्नी होना), ४७.१७(वसुदेव एवं उपदेवी - पुत्र), १४५.१०७(कश्यप कुल के ६ ब्रह्मवादियों में से एक ), वामन ८४.६४(देवल के शाप से हू हू नामक गन्धर्व को ग्राह योनि की प्राप्ति, विष्णु चक्र से विदीर्ण होने पर ग्राह रूप धारी गन्धर्व को स्वर्ग प्राप्ति ) , वायु २३.२०५/१.२३.१९३(भगवद् अवतार श्वेत के ४ पुत्रों में से एक), ५९.१०३(६ ब्रह्मवादी काश्यपों में से एक), ६६.२६ (ऋषि, प्रत्यूष - पुत्र, क्षमावन्त व मनीषि - पिता), ७०.२८/२.९.२७(वर प्रभृति देवों के देवल की प्रजा होने का उल्लेख), ७२.१७/२.११.१७(असित व एकपर्णा - पुत्र), ९१.१००/२.२९.९६(विश्वामित्र के पुत्रों में से एक), विष्णु १.१५.११७ (प्रत्यूष वसु - पुत्र), ४.४.१०६(पारियात्र - पुत्र, वच्चल - पिता, कुश वंश), विष्णुधर्मोत्तर १.१९३.५ (देवल द्वारा हा हा - हू हू को गज व ग्राह बनने का शाप), शिव ३.५(२३वें द्वापर में शिव अवतार श्वेत के ४ पुत्रों में से एक), स्कन्द १.२.८.३८(सुदर्शना - पिता), १.२.१३ (शतरुद्रिय प्रसंग में देवल द्वारा यव लिङ्ग की पूजा), २.१.२६(गार्ग्य के पूछने पर देवल ऋषि द्वारा घोण तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन), २.७.१८.६४(स्तम्ब द्विज की पत्नी कान्तिमती द्वारा देवल मुनि की सेवा का उल्लेख), ४.२.९७.१७१(देवलेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.१.५३ (दुष्ट चरित्र ब्राह्मण, द्विज हत्या से पिशाच बनना, सुन्दर कुण्ड में स्नान से मुक्ति), ५.३.१५९.२५(देवलक गमन से चाण्डाल योनि की प्राप्ति?), हरिवंश १.१८.२३(हिमालय व मेना - कन्या एकपर्णा को असित देवल को पत्नी रूप में  प्रदान करने का उल्लेख), १.२३.२५(देवल - कन्या सन्नति की ब्रह्मदत्त द्वारा पत्नी रूप में प्राप्ति), १.३५.३(देवल? की सात पुत्रियों सहदेवा आदि के नाम), लक्ष्मीनारायण १.४८८.७९(असित - पुत्र, रत्नमाला - पति, रम्भा अप्सरा के शाप से अष्टावक्र बनना, अष्टावक्र के मोक्ष का वृत्तान्त), ४.१६.९३(देवलक : विनोदिनी - पति, कृष्ण - कृपा से सखीत्व भाव की प्राप्ति), कथासरित् ८.२.३४९(मुनि, कालिन्दी , मुद्रिका तथा दर्पकमाला - पिता ) । devala

 

 

 

देववती वामन ६३+ (कन्दरमाला - पुत्री, वानररूप धारी विश्वकर्मा द्वारा हरण, चित्राङ्गदा से भेंट का वृत्तान्त), वा.रामायण ७.५.२(ग्रामणी नामक गन्धर्व द्वारा स्व कन्या देववती को सुकेश राक्षस को प्रदान करना ) । devavatee/ devvati

 

 

 

देववर्णिनी ब्रह्माण्ड २.३.८.३९(बृहस्पति - पुत्री, विश्रवा - पत्नी, कुबेर - माता), वायु ७०.३३(बृहस्पति - कन्या, विश्रवा की ४ पत्नियों में से एक, वैश्रवण कुबेर - माता), विष्णुधर्मोत्तर १.२१९.४(विश्रवा - भार्या, वैश्रवण - माता, बृहस्पति - पौत्री, भरद्वाज प्रसंग), लक्ष्मीनारायण २.८६.३९(विश्रवा की ४ पत्नियों में से एक, कुबेर - माता ) । devavarnini/devavarninee

 

 

 

देववान् ब्रह्म १.१३.५६(देवक के ४ पुत्रों में से एक, देवकी भ्राता), ब्रह्माण्ड २.३.७१.११३(अक्रूर व उग्रसेनी के पुत्रों में से एक), २.३.७१.१३०(देवक के ४ पुत्रों में से एक, ७ भगिनियों के नाम), ३.४.१.९४(१२वें मन्वन्तर में रुद्र सावर्णि मनु के १२ पुत्रों में से एक), भविष्य ३.४.२२.१५ (मुकुन्द - शिष्य, जन्मान्तर में केशव कवि), भागवत ८.१३.२७(१२वें मन्वन्तर में रुद्र सावर्णि मनु के १२ पुत्रों में से एक), ९.२४.१८(अक्रूर के २ पुत्रों में से एक), ९.२४.२२(देवक के ४ पुत्रों में से एक, ७ भगिनियों के नाम), मत्स्य ४४.७२(देवक के ४ पुत्रों में से एक, ७ भगिनियों के नाम), ४५.३१(अक्रूर व उग्रसेनी के पुत्रों में से एक), वायु १००.९८/२.३८/९८(१२वें मन्वन्तर में रुद्र सावर्णि मनु के १२ पुत्रों में से

 

एक), विष्णु ३.२.३६(१२वें मन्वन्तर में सावर्णि मनु के पुत्रों में से एक), ४.१४.१०(अक्रूर के २ पुत्रों में से एक), ४.१४.१७(देवक के ४ पुत्रों में से एक, ७ भगिनियों के नाम ) । devavaan

 

 

 

देववीति भागवत ५.२.२३(मेरु की ९ कन्याओं में से एक, केतुमाल - पत्नी)

 

 

 

देवव्रत मत्स्य ५०.४५(शन्तनु व गङ्गा - पुत्र भीष्म का अपर नाम), स्कन्द २.७.२४.२२(द्विज, पत्नी की शुनी योनि से मुक्ति प्राप्ति की कथा ) । devavrata

 

 

 

देवशयन भविष्य ४.७०.२(चातुर्मास में विष्णु शयन का विधान, मन्त्र, नियम, व्रत आदि का वर्णन ) ।

 

 

 

देवशर्मा पद्म ५.८७+ (ब्राह्मण, सुमना - पति, वसिष्ठ द्वारा देवशर्मा के पूर्वजन्म के वृत्तान्त का कथन : पूर्वजन्म में शूद्र, पुत्र प्राप्ति हेतु वैशाख मास व्रत का अनुष्ठान, पुत्र प्राप्ति का वृत्तान्त ) , ५.८९ (सुमना - पति देवशर्मा ब्राह्मण को वसिष्ठ द्वारा उसके पूर्वजन्म के वृत्तान्त का कथन : पूर्व जन्म में शूद्र), ६.१५.१३ (विष्णु द्वारा वृन्दा के समक्ष धारित मुनि रूप, भरद्वाज - पुत्र), ६.७७ (भग्ना - पति, वृषभ रूप पिता व शुनी रूपी माता के तारणार्थ ऋषि पञ्चमी व्रत का अनुष्ठान), ६.८८(गुणवती - पिता, चन्द्र - गुरु, जन्मान्तर में सत्राजित), ६.८९(वही),  ६.१७६ (देवशर्मा द्वारा मित्रवान् से गीता के द्वितीय अध्याय के माहात्म्य का श्रवण), मत्स्य ४४.७९(शोणाश्व के ५ पुत्रों में से एक), वायु ६०.६६(रथीतर के ४ शिष्यों में से एक), स्कन्द १.२.३.४१(देवशर्मा द्वारा सुभद्र को निज पुण्य का चतुर्थाश दान), २.४.७.७३ (देवद्रव्य का अपहारक, मार्जार योनि की प्राप्ति), २.४.१२.३८(देवशर्मा - पुत्र दुराचार का शाप से मूषक होना, कार्तिक कथा से मुक्ति), २.४.१३.१८ (गुणवती - पिता देवशर्मा का सत्राजित् रूप में जन्म), २.५.१ (देवशर्मा ब्राह्मण का शूद्र द्वारा सत्कार), २.५.१२ ( देवशर्मा द्वारा एकादशी व्रत का उपदेश), ६.३१ (देवशर्मा ब्राह्मण द्वारा विष्णुसेन राजा से पिता के श्राद्ध का निमन्त्रण स्वीकार करना), ७.१.२२५ (देवशर्मा द्वय का वृत्तान्त : यम से नरक सम्बन्धी संवाद), महाभारत अनु ७६(४०-गीताप्रेस) ( देवशर्मा – शिष्य विपुल द्वारा गुरु-पत्नी रुचि की इन्द्र से रक्षा का वृत्तान्त), लक्ष्मीनारायण १.४२८.४०(शूद्र दम्पत्ति द्वारा तृषा आदि से पीडित देवशर्मा ब्राह्मण की सेवा, देवशर्मा द्वारा शूद्र दम्पत्ति के पिछले जन्म के वृत्तान्त का वर्णन व कृष्ण भक्ति का उपदेश), ३.९३.४(विप्र, स्वपत्नी रुचि की शील लक्षण की कथा), कथासरित् २.२.९(पाटलिपुत्र निवासी देवशर्मा उपाध्याय द्वारा कालनेमि और विगतभय द्विजों को विद्या प्रदान के पश्चात् अपनी कन्याद्वय प्रदान), १०.८.३ (ब्राह्मण, देवदत्ता - पति, विचार किए बिना शीघ्रता में पालतू नेवले का वध ) । devasharmaa

 

Comments on Devasharma -Aashaadhbhuti story

 

देवश्रवा ब्रह्माण्ड १.२.३२.११८(विश्वामित्र के १३ श्रेष्ठ पुत्रों में से एक), २.३.७१.१४९ (शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक), भागवत ९.२४.२८(शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक), ९.२४.४१(कंसवती - पति, २ पुत्रों के नाम), मत्स्य ४६.२(शूर व भोजा के १० पुत्रों में से एक), वायु ९६.१८५/ २.३४.१८५(देवरात के पुत्रों में से एक), विष्णु ४.१४.३०(शूर व मारिषा के १० पुत्रों में से एक ) । devashravaa

 

 

 

देवश्रेष्ठ ब्रह्माण्ड ३.४.१.९४(बारहवें मनु रुद्र सावर्णि के १२ पुत्रों में से एक), भागवत ८.१३.२७(बारहवें मनु रुद्रसावर्णि के १२ पुत्रों में से एक), वायु १००.९८/ २.३८.९८(बारहवें मनु ऋतुसावर्णि के १२ पुत्रों में से एक), विष्णु ३.२.३६(१२वें मनु के पुत्रों में से एक ) । devashreshtha

 

 

 

देवसख गर्ग ७.२९.२३(स्वर्ण चर्चिका नगरी के राजा देवसख द्वारा प्रद्युम्न का पूजन), लक्ष्मीनारायण ३.२५.४ (देवसख आदि ५ विप्रों द्वारा प्रसविष्णु असुर को लक्ष्मी व कामादि प्रदान करने का वर्णन, भविष्य के ५ इन्द्रों में से एक ) । devasakha

 

 

 

देवसर्ग भागवत ३.१०.१६, २६(६ प्राकृत सर्गों में से पञ्चम), वायु ६.६३(तीन प्राकृत सर्गों में से एक ) ।

 

 

 

देवसावर्णि भागवत ८.१३.३०(१३वें मनु का नाम, चित्रसेन आदि के पिता), लक्ष्मीनारायण ३.१५६.८६ (सुधर्म विप्र का यज्ञादि से रुचि व मालिनी - पुत्र देवसावर्णि मनु बनना ) । devasaavarni

 

 

 

देवसिंह भविष्य ३.३.१.२७ (भीष्मसिंह - पुत्र), ३.३.८.३२ (सहदेव का अवतार), ३.३.१०.५० (देवसिंह द्वारा मनोरथ हय की प्राप्ति), ३.३.१२.२७ (कृष्णांश की सेना में रथियों का अधिपति), ३.३.१५.१२ (देवी द्वारा देवसिंह की परीक्षा व वरदान ) । devasimha/ devasingh

 

 

 

देवसेन कथासरित् ३.१.६३(राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा), ३.४.३१(देवसेन नामक गोपालक की आज्ञा से ब्राह्मण के पैर कर्त्तन की कथा), ३.४.२५९(राजा, दुःखलब्धिका- पिता, पुत्री के पतियों के मरण की कथा), ६.३.७१(कीर्त्तिसेना और देवसेन की कथा) ६.७.६२(वैश्यकन्या उन्मादिनी और राजा देवसेन की कथा ) । devasena

 

 

 

देवसेना देवीभागवत ९.१.७८ (प्रधान मातृका, षष्ठी नाम), ९.४६.५ (देवसेना द्वारा प्रियव्रत के मृत पुत्र को जीवित करना, अन्य नाम षष्ठी, स्तोत्र व पूजा विधि), नारद १.११५.३८(कार्तिक शुक्ल षष्ठी में षण्मुख व देवसेना की पूजा), ब्रह्मवैवर्त्त २.१.७९(प्रकृतिदेवी का प्रधान अंश, श्रेष्ठ मातृका), २.४३ (षष्ठी नाम, बालकों की धात्री, प्रियव्रत का उपाख्यान), ब्रह्माण्ड ४.३०.१०५(इन्द्र - पुत्री, स्कन्द - पत्नी, तारकासुर के वध से प्रसन्न होकर  इन्द्र द्वारा कन्यादान), मत्स्य १५९.८ (इन्द्र द्वारा स्कन्द को देवसेना कन्या पत्नी रूप में प्रदान), स्कन्द १.१.२८.११(कुमार द्वारा मृत्यु - कन्या सेना/एक सुन्दरी के वरण का कथन ) । devasenaa